छाती में धंसी हुई कील

शुक्रवार, 24 जून 2011
हरे भरे वृक्षों पर लोग लोहे की कील से अपना विज्ञापन ठोक जाते हैं। ऐसी कोई जगह नहीं बची जहाँ विज्ञापन न हो। इन वृक्षों में धंसी हुई कील देख कर लगता है कि यह मेरी छाती में ही धंसी हुई है। जिसकी पीड़ा का अहसास मुझे हो रहा है। एक तरफ़ तो सरकार वृक्ष लगाने के लिए हरियाली कार्यक्रम चला रही है, दूसरी तरफ़ वृक्षों को घायल किया और काटा जा रहा है। पी डब्लु डी वाले इन पर कार्यवाही क्यों नहीं करते?


5 टिप्पणियाँ:

  1. : केवल राम : ने कहा…:

    काश ऐसी पीड़ा सबको होती ...!

  1. वन्दना ने कहा…:

    उफ़ …………सच मे पीडा का अनुभव हो रहा है।

  1. anu ने कहा…:

    काश आप जैसी सोच हर किसी की होती

  1. काश! संस्कारों को सहेज, अनुशासन मे जीते, चहुं ओर 'अराजकता'की चासनी के घूंट क्यों पीते|पर्यावरण बचाने की नही, खाक मे मिलाने की मिली है 'ढील'| धरती की छाती मे ठोंक ले मन चाहे 'कील'|…………ललित भाई कम शब्दों मे सब कुछ कह देना, यही है आपकी खासियत्……।बहुत सुंदर|

  1. S.M.HABIB ने कहा…:

    सार्थक प्रश्न उठाया है भईया.....

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